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कार्मिकों की उपयुक्तता का मूल्यांकन
 चयन समिति को कार्मिकों की उपयुक्तता का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने के लिये अपना तरीका निर्धारित करने की पूर्ण स्वतंत्रता है । मा0 उच्चतम न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों में जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं, में यह विधि निर्धारित की है कि चयन समिति के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है और बदनीयत अथवा प्रक्रियागत अनियमितता के सीमित आधार को छोड़कर चयन समिति द्वारा किये गये किसी कार्मिक के मूल्यांकन का पुनरीक्षण करने के लिये उसे निर्देशित नहीं किया जा सकता है :-

(क) नूतन अरविन्द बनाम भारत संघ व अन्य (1996) 2 सुप्रीमकोर्ट केसेज-488
(ख) संघ लोक सेवा आयोग बनाम एच0एल0 देव व अन्य (एआईआर 1988 एससी 1069)
(ग) दलपत अबा साहब सोलंकी बनाम बी0एस0 महाजन (एआईआर 1990 एससी 434)
(घ) अनिल कटियार बनाम भारत संघ व अन्य (1997(1) एसएलआर 153)
(ड.) भारत संघ व अन्य बनाम एस0के0 गोयल व अन्य, अपील(सिविल) नं0-689/2007

2- चयन समिति द्वारा पात्र अभ्यर्थियों का उपयुक्त एवं अनुपयुक्त के रूप में वर्गीकरण किये जाने के सम्बन्ध में सेवा नियमावली या शासनादेशों में कोई मापदण्ड निर्धारित नहीं है और न ही इस सम्बन्ध में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध हैं । संतोषजक सेवा निर्धारण के सम्बन्ध‍ में कार्मिक विभाग, उ0प्र0 शासन के शासनादेश संख्या: 761/कार्मिक-1/1993 दिनांक 30-06-1993 और शासनादेश संख्या: 13/22/1993-का-1/2004 दिनांक 27-10-2004 सुसंगत हैं । तदनुसार पात्र अभ्यर्थियों की संतोषजनक सेवा निर्धारित होने पर उन्हें प्रोन्नति हेतु उपयुक्त माना जा सकता है । यह मार्गदर्शक सिद्धांत निम्नलिखित हैं :-

 (अ) संतोषजनक सेवाओं के सम्बन्ध‍ में निर्णय लेने के दिनांक के पूर्व जिस समय तक के अभिलेखों के आधार पर सम्बन्धित सरकारी सेवक को संतोषजनक सेवा के आधार पर कोई लाभ अनुमन्य कराया जा चुका हो अथवा उसे पदोन्नति प्रदान की जा चुकी हो अथवा उसका स्थायीकरण किया जा चुका हो अथवा उसे दक्षतारोध अनुमन्य कराया जा चुका हो, उन सेवा अभिलेखों को पुन: विचार में न लिया जाय, वरन उसके पश्चात के सेवा अभिलेखों के आधार पर ही संतोषजनक सेवा का निर्धारण किया जाय ।
(ब) यदि उस अवधि में, जिसके सेवा अभिलेख विचार क्षेत्र में आते हैं, किसी वर्ष की सत्यनिष्ठा प्रमाणित न की गयी हो, परन्तु अनुवर्ती समस्त वर्षो (जिसकी संख्या कम से कम पांच अवश्य हो) की सत्यनिष्ठा लगातार प्रमाणित की जाती रही हो, तो केवल एक वर्ष की अप्रमाणित सत्यनिष्ठा के आधार पर सेवाओं को असंतोषजनक न माना जाय ।
(स) यदि उस अवधि में कोई निन्दा प्रवि‍ष्टि विद्यमान हो और उस निन्दा प्रविष्टि से सम्बन्धित घटना की तिथि के बाद की अगले पॉच वर्ष की अवधि में कोई अन्य प्रतिकूलता (यथा प्रतिकूल प्रविष्टि, दण्ड आदि) न हों तो उस निन्दा प्रविष्टि को संतोषजनक सेवा के मूल्यांकन हेतु विचार में न लिया जाय अर्थात नजरन्दाज कर दिया जाय ।
(द) यदि सम्बन्धित अवधि में कोई सुझावात्मक प्रविष्टि या चेतावनी दी गयी हो तो उसे संतोषजनक सेवा के मूल्यांकन हेतु विचार में न लिया जाय ।
(य) यदि सम्बन्धित अवधि में निन्दा प्रविष्टि से भिन्न कोई अन्य लघु दण्ड या वृहद दण्ड दिया गया हो अथवा एक से अधिक बार पांच वर्ष के अन्तराल से कम अवधि में निन्दा प्रविष्टि दी गयी हो, तो संतोषजनक सेवा के मूल्यांकन हेतु सम्बन्धित अवधि के समस्त सेवा अभिलेखों के आधार पर सावधानीपूर्वक विचार कर सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वविवेक से समुचित निर्णय लिया जाय ।
(र) यदि सम्बन्धित अवधि में एक से अधिक वर्षो की सत्यनिष्ठा पांच वर्ष के अन्तराल से कम अवधि में अप्रमाणित कर दी गयी हो तो सामान्यतया उक्त अवधि की सेवाओं को असंतोषजनक समझा जाय ।

                उक्त शासनादेश में यह उल्लेख किया गया है कि उक्त मार्गदर्शक सिद्धान्त केवल सक्षम प्राधिकारियों के पथ प्रदर्शनार्थ हैं । यह किसी विषय विशेष पर इस सम्ब‍न्ध में लागू नियमों को अवक्रमित नहीं करते हैं और न ही इस सम्बन्ध में सक्षम प्राधिकारियों के विवेकाधिकार के विरूद्ध किसी सरकारी सेवक को किसी प्रकार का कोई अधिकार प्रदान करते हैं।
                (शासनादेश संख्या : 761/कार्मिक-1/1993 दिनांक 30-06-1993 और शासनादेश संख्यां: 13/22/1993-का-1/2004 दिनांक 27-10-2004)
 

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